Poetry

देवी रूपी मां

है तो वो हम सब से छोटी उम्र में
लेकिन है बहुत ही ज्ञानी संसारी कार्यों
और मनुष्य की मनोवृत्ति समझने में।
हमारे घर की करता धर्ता वे ही हैं
पूरे घर के कार्य वे ही संभालती हैं
हम सब की देख भाल तो ऐसे करतीं हैं
जैसे हम छोटे बच्चे हैं
उन्हें हमारी चिंता सदैव लगी रहती है।
जाना पड़े अगर उन्हें शहर के बाहर
एक मां की तरह कर जाती हैं सब इंतजाम
हो न जिसमें हमे कोई तकलीफ किसी भी प्रकार की
और मौका मिलते ही करतीं हैं फ़ोन
पता लगाने, की हम सब ठीक तो हैं!
ऐसे क्षण पर
याद आ जाती है मुझे अपनी प्यारी स्नेही मां की।
वे भी जब भी कहीं जाती थी बाहर गांव
इसी तरह से प्यार से सब कुछ समझाती थी
और हमेशा कहती थी
लड़ाई झगड़ा मत करना
एक दूसरे का ख़्याल रखना
हिलमिल के रहना
वापिस आनें पर मुझे किसी की भी
शिकायेते नहीं सुन्नी।
बिलकुल वैसे ही
एक मां की तरह वो समझा रही थी हमे
आंखें मेरी भर आई ये सोच कर कि–
अपनो ने भी कभी नही किया हमारे लिए इतना
जितना इस देवी रूपी मां और उनके घरवालों ने!
फिक्र उन्हे लगी रहती है हम सब की क्योंकि
घिरे है हम अनेको शत्रुओ से
कुछ जाने पहचाने और कुछ अपरिचित
जिनसे हमें कुछ भी लेना देना नही है
बनकर पराए, अपने ही हमें लूटना चाहते है–
बहुत हद तक तो हमे लूट लिया है उन्होंने
तन मन धन से
सड़क पर नंगा खड़ा करना चाहते थे
ये दुष्ट घनेरे हमें
लेकिन कर न पाए ऐसा पूरी तरीके से
क्योंकी—
ये देवी खड़ी हो गई
बनकर ढाल हमारी।
कुछ न बिगाड़ सके ये मलिच्छ शैतान
आग बबूला होकर तब
तीव्रता से किया आक्रमण हम सब पर
लेकिन–
नुक्सान हुआ उनका ही!
ये उम्र मे हमसे छोटी अवश्य है लेकिन
हुनर मे है हम सब की दादी
वैसे तो है शांत स्वभाव की
जीत लेती है हमे
अपनी मीठी मीठी बातों और
एक सुंदर मुस्कान से,
लेकिन
चढ़ता है जब पारा तब तेजी से बढ़ जाता है तापमान
कोपभवन मे प्रवेश हो जाती हैं तब
ओढ़ लेती हैं चादर प्रकोप का!
होते हैं तब ईश्वर ही हमारा सहारा
मुंह पर लगाकर ताला
करते हैं हम सब अपना अपना काम शांति से
छा जातें हैं बादल अशांती के और–
अतिशय खराब वातावरण बरसता है चारो ओर
लिपट जाते है हम सब उसकी चादर मे
लगता नही है फिर, की है
ये घर सुख चैन का
होता है ऐसा हमारी ही अंजान गलतियों से।
माना गलती की हमने
लेकिन ये भी तो सच है की
हैं तो हम सब इंसान ही
न समझ होते हैं हम कई मामलो मे
उम्र मे कितने ही बड़े – छोटे क्यों न हो हम
बहुत हद तक अनेक चीज़ों मे
हम जैसे इंसान होते हैं मूर्ख
क्योंकि
ऐसी स्थिति मे पहले कभी नही पड़े हम।
जिस विषय से हम अज्ञात हैं
उस में हमे रुची होती कैसे, अब आप ही बताईए
जो मालूम ही नहीं है उसके बारे मे
हम सोच ही कैसे सकते हैं!
बीच मजधार मे गिर जाते है हम
तब
निहारते है दोनो तट को भ्रमित होकर
नासमझ की दलदल में फस जाते है हम कई बार
और
ढूंढते रह जाते हैं हम वोह किनारा जो
कभी जल्दी मिल जाता है तो
कभी निकल जाते है कई हफ्ते इसकी खोज मे
भयंकर स्तिथि मे जीवन तब हो जाता है,
जकड़ जाते हैं तब हम
मानसिक तनाव मे
हो सकता है ये घड़ी है हमारी परीक्षा की
पर परिणाम
इसका बहुत ही खराब होता है दिमाग पर हमारे
हांथ जोड़कर मांगते है हम सब ईश्वर से क्षमा और विनती करते है की
आप हम जैसे ना समझ इंसानों की करे मदद
और घिने विचार और शैतानी दरिद्र कार्य करने वालो
को ऐसा दंड दे की
वे दस बार सोचेंगे
ऐसे दुष्ट काम करके किसी की ज़िंदगी बर्बाद करने के पहले।
                                                           
~Poornima 
India

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