Poetry

प्यार के लिफ़ाफे में

खो कर अब, तुम्हे पाए भी क्या,
आंसू भरी आंखों से निभाए भी कैसे…
टूटना था दिल टूट ही गया,
जो अपना ही नही,
अब उसे पुकारे भी कैसे…
कितने जी जान  से चाहा था,
 इबादत की तरह,
जिनके सजदे करते,
अब इल्ज़ाम लगाएं भी कैसे
उनकी तो जिद्द है, कि
अपनी फितरत ना बदलेंगे
अब ऐसे क़ाफ़िर को,
बंदगी सिखाए कैसे…
उनके  दिल में मेरे लिए,
रत्ती भर भी जगह न थी,
फिर ये बात अब तलक
 हम समझ न पाए कैसे…
या रब तेरी मंजूरी कुछ तो रही होगी,
वरना प्यार के लिफ़ाफे में,
वो खत जुदाई का लिख पाए कैसे….
                                                                    
~Dr. Neeru Jain 
Jaipur, India

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