तुम  सामने  नहीं तो  तरसती  हैं निगाहें

और अजनबी सा देख कसकती  हैं निगाहें

फूलों में तुम मिलो तो महकती हैं निगाहें

शबनम के जाम पी के बहकती हैं निगाहें

तुम रु-ब-रु तो तुम पे अटकती हैं निगाहें

वरना  कहाँ कहाँ  पे  भटकती  हैं निगाहें

चाहत की चाँदनी में चहकती  हैं निगाहें

बिरहा में दुपहरी सी  दहकती  हैं निगाहें

 अपनों से दूर होके छलकती हैं निगाहें

सावन की घटाओं सी बरसती हैं निगाहें


In  your  absence, for  you, my  eyes  thirst

When you look like outsider ,my eyes hurt

Meeting amongst flowers, eyes become fragrant

Drunk  on  dew  drops,  eyes  turn  vagrant

When you’re face to face, eyes linger on to you

Else, here and there they wander searching for you

In moonbeams  of love, eyes become eloquent

And  in  separation, like  mid  day  sun – ardent

Far from the dear ones, overflow  the  eyes

Like  rain clouds, pour down the eyes

                                            ~Sudha Dixit

                                                     Bangalore, India

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