Poetry

प्रकृति का दुख

रो रही है प्रकृति भी

आज अपनी ये बेकद्री देखकर

निकल रहे हैं आंसू उसके

अपनी उजड़ती हुईं हरियाली को देखकर

 

रो रही है आज नदियां सारी

खुद को यूं कूड़े-कचरे से गंदा पाकर

पूजी जाती थी जो पहले कभी

गंगा, यमुना पावन नदियों के नाम पर

 

रो रहे हैं आज पेड़-पौधे सारे

जड़ से ये जो कट रहे हैं

रौनक रहती थी सड़कों पर इनसे

आज यूं जमीन पर बिखर रहे हैं

 

रो रहे हैं फूल सारे

इंसानों का ये बर्ताव देखकर

तोड़ रहे हैं जो इनकी कोमल पंखुड़ियों को

इनको यूं बेजान समझकर

 

~ Ishika Choudhary

Ghaziabad, India

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