Poetry

नया आशियाना!

रातभर बारिश हो रही थी कल,

रात भर चिड़िया रो रही थी कल|

कुछ इस तरह आशियाना टूटा है,

भीगे तूफ़ानो ने सब कुछ लूटा है|

भले ही गलती बारिश की हो,

पर अब न कर पाएंगी किसी शाख पे भरोसा वो|

कभी हुआ करती थी वो शाख की दुलारी,

उसीने तो ली थी चिड़िया को संभालने की जिम्मेदारी|

तो क्या वो झूठ था, बहाना था?

आरे, तब मौसम भी तो सुहाना था|

बुरे वक्त में कौन देता है सहारा,

ज़िन्दगी भर के वादे करनेवाला भी नहीं होता हमारा|

अब समेटना है तिनका तिनका उसे,

बल बढ़ाना है अपने मन का उसे|

भरनी है उड़ान अपने पंखों को मज़बूत कर,

ताकि, ना रेहना पाये किसी शाख पे निर्भर|

शाख का क्या है, उसे फिर कोई घरौंदा बनाने वाला मिल जायेगा,

पर चिड़िया को अब ऐसा आशियाना बनाना है,

जहां कोई बारिश, कोई तूफ़ान, उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा|

 

~ Rasshmie Salunkhay 

Maharashtra, India

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