Poetry

क्यूंकि मैं मेरे जैसी हूं

बचपन से हम खुद जैसे कहाँ रहते हैं

कभी भाई जैसा कभी बहन जैसा कभी

पड़ोसी के बच्चों जैसा

ये जो कमपेयर करने का गेम है

वो चलता ही रहता है

बिना रुके जिंदगी भर

कब तक चलेगा क्या पता

क्या हम नहीं जी सकते, जैसे हैं

लोग क्यूँ हमें एक्सेप्ट नहीं करते

हमारी तरह.

 

मैं मेरी तरह बनना चाहती हूँ

जैसी मैं बचपन से हूं

अपने जैसी सुन्दर अपने जैसे चंचल

पर जबसे ये तुलना करने का

खेल शुरू हुआ है ना

तबसे कुछ बचा ही नहीं

अब मैं अपने जैसी नहीं रही

हर उस जैसी बनना चाहती हूं

जिससे मेरी तुलना होती रही है.

 

मैं अब मैं नहीं रही, मेरे अन्दर

जलन की भावना घर कर चुकी है,

द्वेष है क्यूंकी मैं लाख कोशिश कर लूं

मैं किसी और जैसी कभी

बन ही नहीं सकती क्यूँकि

मैं तो मेरे जैसी हूं ना.

 

बड़े हुए तो दोस्त जैसी,

ननद जैसी देवरानी जैसी

जेठानी जैसी, इसको देखो,

उसको देखो, तुम भी बन जाओ उस जैसी

पर कैसे, मास्क लगा लूँ, मेकअप कर लूं

कैसे बन जाऊँ उस जैसी

मैं तो मेरे जैसी हूं.

 

रहने दो ना मुझे मेरे जैसी

घुटन होती है कोई और बनकर

किसी और जैसा बनकर

मुझमें कोई कमी है क्या?

कमी तो कुछ नहीं पर

दूसरे तुमसे बेहतर हैं

अच्छा तुम्हें कैसे पता?

 

मुझमे तुम लाख कमियां

गिनाते हो कभी खुद को

आईने में क्यूं नहीं देख पाते हो

मैं मेरे जैसी हूं और

यही मेरी पहचान है

मुझे किसी और से मत तोलो

मैं कोई और नहीं बन सकती

किसी और सांचे में मैं नहीं ढल सकती

क्यूँकि मैं सिर्फ मेरे जैसी हूं.

 

                                                                       ~ Dr Shivangi Shrivastava

                                                                         Motihari, India

7 Comments

  1. Ashish srivastava

    Wonderful.

  2. A very simple thing has been presented very well in the poem. It’s true human beings can’t let others live the way they are but always keep comparing each other with someone else & wish you to become like them forgetting that if God has made each one of us different He must have had a reason. Moreover why can’t we have our own individuality? Is there a rule that all should be the same?

  3. very beautifully expressed in simple words. The tragedy of human life is that there are people who expect others to transform their personality according to their whim and fancy…but have little time to peep into their own conscience. Only a chameleon can change its personality and color and only self centered and conceited ones can do that!

  4. why do comments disappear?

  5. Thank you so much for appreciting my composition.

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