Poetry

सड़क

देखा है मैंने वाहनों को सर्र से निकलते हुए

पहियों को आग उगलते हुए

और अकसर चालकों की गलती से

कई  गाड़ियों को उलटते हुए

कई दिनों के सन्नाटे के बाद

पदचाप सुनी

साइकिल की चेन की आवाज सुनी

कुछ तेज कदम

कुछ भारी कदम

नन्हे कदमों की कोमल थाप

नंगे पैरों की सकपकाई चाप

मेरी गरम सतह पर कुलबुलाते

पनीली आँखों से आँसू छलकाते

पर लगातार चलते पाँव

रिसते छालों वाले पाँव

रात को भूख से सुबकते सोते

सुबह फिर चल पड़ते, न रुकते

फिर कभी खून यहाँ छिटका तो कभी वहाँ

हौसला न कम हुआ, ऐसा कारवाँ !

लहूलुहान पैर चलते ही रहे

मेरा सीना रंगते ही गए

न मौत का डर न जान की फिक्र

तुम शायद भूल जाओ उनका जिक्र

मैं तो सड़क मात्र हूँ

गूँगी हूँ, निरंतर हूँ

चिरकाल तक यूहीं रहूँगी

गाँव को शहर, शहर को गाँव से जोड़ती रहूँगी

पर अपने काले सीने से

इन रक्त रंजित पैरों के निशान न मिटने दूँगी।

                                                                              ~ Punam Sharma

                                                                                   India

2 Comments

  1. Latika Agarwal

    Tugs your heart … beautifully written

  2. well expressed … and an eye opener

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