जब तुमने था छू लिया मुझे

तेरा  स्पर्शन  था  मानो  उर  की  वीणा  को  छू  देना

झंकृत  कर  देना  मन  को  औ’  मधु  पीड़ायें  उकसा  देना

सिहरन  सी  दौड़  गयी  तन  में

जब  तुमने  था  छू  लिया  मुझे

उस  छू  लेने  की  सुरभि  से  भर  गया  हृदय, मैं  महक  उठी

अंतस्तल  में  फूटी  कविता, बन  गया  गीत, मैं  चहक  उठी

कई  बार  निहारा  अपने  को

जब  तुमने  था  छू  लिया  मुझे

उस  लघु  क्षण  की मोहकता  ने  मुझ  में  हैं  कितने  भाव  भरे

हाँ  हर्ष  व्यथा  से  श्लिष्ट  नयन से  कितने  आंसू  आज  झरे

मैं  भूल  गयी  अपने  को  भी

जब  तुमने  था  छू  लिया  मुझे

मेरे  मन  की  गहराई  तक  पहुंचा  मधुरिम  वो  स्पर्शन

आँखों  के  नभ  में  उतर  गया  उस  पल  का  चन्दा  सा दर्शन

और  तन मन में  भर  गयी  पुलक

जब  तुमने  था  छू  लिया  मुझे

When  you  caressed  me

Your touch was like stroking

The strings of an organ

Reverberating heart ,

Stirring up some pain

A thrill ran through my body

When you caressed me

Essence of that touch in my heart

Made me so fragrant

Poems, in me, turned melodious

I became eloquent

Looked at myself repeatedly

When you caressed me

That tiny moment’s charm

Proffered many emotions

Eyes shed so many tears

With glee and tribulations

I forgot what I was readily

When you caressed me

You reached and touched

Sweet  heart’s depth

That moment’s lunar beauty,

My eyes cherished and kept

Ecstasy filled me vibrantly

When you caressed me

                               ~Sudha Dixit

                                Bengaluru, India

 

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